‘‘भारतेंदु जी के नाटकों में पाखंड-खंडन का सजीव चित्रण’’
Keywords:
भारतेंदु हरिश्चंद्र, पाखंड-खंडन, व्यंग्य, सामाजिक चेतना, अंधविश्वास, रूढ़िवाद, हिंदी नवजागरण, नाट्य-साहित्यAbstract
हिंदी साहित्य के आधुनिक युग के प्रवर्तक भारतेंदु हरिश्चंद्र ने नाटक को केवल मनोरंजन का साधन न मानकर सामाजिक जागरण और वैचारिक परिवर्तन का प्रभावशाली माध्यम बनाया। उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्ध भारतीय समाज में धार्मिक रूढ़ियों, अंधविश्वासों, सामाजिक विसंगतियों, नैतिक पतन और औपनिवेशिक शोषण का समय था। भारतेंदु ने अपने नाटकों में इन विकृतियों को प्रत्यक्ष अथवा प्रतीकात्मक रूप में अभिव्यक्त किया। विशेषतः ‘अंधेर नगरी’, ‘भारत-दुर्दशा’, ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’, ‘सत्य हरिश्चंद्र’, ‘नीलदेवी’ आदि रचनाओं में पाखंड, आडंबर और कथनी-करनी के अंतर पर तीखा प्रहार दिखाई देता है।
भारतेंदु के यहाँ पाखंड-खंडन केवल धार्मिक पाखंड तक सीमित नहीं है, उसमें राजनीतिक, सामाजिक, नैतिक और प्रशासनिक पाखंड भी सम्मिलित हैं। उनका व्यंग्य व्यक्ति-विशेष की निंदा से आगे बढ़कर उन सामाजिक संस्थाओं और मानसिक प्रवृत्तियों की आलोचना करता है जो शोषण और अज्ञान को बनाए रखती हैं। इस दृष्टि से भारतेंदु का नाट्य-साहित्य हिंदी नवजागरण की आलोचनात्मक चेतना का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है। आधुनिक शोध भी भारतेंदु के नाटकों में अंधविश्वास, रूढ़िवाद, धार्मिक पाखंड, नैतिक पतन आदि के विरुद्ध सुधारवादी चेतना को रेखांकित करता है।
बीजाक्षर- बीजकुंजी
References
‘‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति(सं० 1930 वि०)’’
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भारतेन्दु नाटकावली, पृ0 690
वही पृ0 661
वही पृ0 689
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